भारत के परमाणु जखीरे में बढ़ोतरी का अनुमान, समुद्री परमाणु क्षमता भी मजबूत
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अमेरिकी थिंक टैंक फेडरेशन ऑफ अमेरिकन साइंटिस्ट्स (FAS) की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक भारत के पास इस समय लगभग 190 परमाणु हथियार हो सकते हैं। रिपोर्ट का अनुमान है कि बीते छह वर्षों में भारत के परमाणु शस्त्रागार में करीब 40 हथियारों की वृद्धि हुई है। उपलब्ध परमाणु सामग्री को देखते हुए आने वाले वर्षों में यह संख्या लगभग 225 तक पहुंचने की संभावना जताई गई है।
FAS के अनुसार, मौजूदा 190 हथियारों में से करीब 160 को विभिन्न मिसाइल प्रणालियों पर तैनात माना जाता है। शेष हथियारों के लिए नई मिसाइल प्रणालियां विकसित किए जाने का अनुमान है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 2026 की शुरुआत तक भारत के पास लगभग 730 किलोग्राम हथियार-ग्रेड प्लूटोनियम उपलब्ध हो सकता है। इस सामग्री का इस्तेमाल भविष्य में अतिरिक्त परमाणु हथियारों के निर्माण के लिए किया जा सकता है। हालांकि, FAS ने यह स्पष्ट किया है कि ऐसे आंकड़े अनुमान पर आधारित हैं और वास्तविक हथियारों की संख्या उनके डिजाइन तथा रिजर्व में रखी परमाणु सामग्री जैसे कारकों पर निर्भर करती है।
नया फास्ट ब्रीडर रिएक्टर कितना महत्वपूर्ण?
अप्रैल 2026 में भारत के 500 मेगावाट प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) ने पहली बार क्रिटिकलिटी हासिल की। FAS के आकलन के मुताबिक, यदि रिएक्टर को लगभग 80 प्रतिशत क्षमता पर संचालित किया जाए तो सैद्धांतिक रूप से इससे हर साल करीब 140 किलोग्राम प्लूटोनियम-239 का उत्पादन संभव हो सकता है।
रिपोर्ट के अनुमान के अनुसार इतनी मात्रा से लगभग 35 परमाणु हथियारों के लिए सामग्री उपलब्ध हो सकती है। हालांकि यह एक सैद्धांतिक आकलन है और वास्तविक हथियार उत्पादन कई तकनीकी एवं रणनीतिक कारकों पर निर्भर करेगा।
समुद्र से परमाणु क्षमता पर भी जोर
भारत अपने परमाणु प्रतिरोधक ढांचे को समुद्री क्षेत्र में भी विस्तार दे रहा है। परमाणु ऊर्जा से संचालित बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियों (SSBN) का बेड़ा भारत की ऐसी क्षमता का अहम हिस्सा है, क्योंकि ये पनडुब्बियां समुद्र में रहकर परमाणु हमले की जवाबी क्षमता बनाए रखने में मदद करती हैं।
रिपोर्ट में आईएनएस अरिदमन के अप्रैल 2026 में नौसेना में शामिल होने का भी उल्लेख किया गया है। इसके साथ भारत की समुद्र-आधारित परमाणु क्षमता को और मजबूती मिलने का अनुमान है।
कुल मिलाकर, FAS का आकलन भारत के परमाणु कार्यक्रम में दो प्रमुख रुझानों की ओर संकेत करता है—एक तरफ हथियारों के लिए उपलब्ध परमाणु सामग्री में संभावित वृद्धि और दूसरी तरफ जमीन के साथ-साथ समुद्र से परमाणु प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करना।
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