कम बारिश से बढ़ी चिंता, जल संकट का खतरा?
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मानसून की कमजोर विदाई ने बढ़ाई चिंता, कम बारिश का असर खेतों से बाजार तक
मानसून की विदाई से पहले चिंता बढ़ी
देश में इस बार सामान्य से कम हुई बारिश
खेती और बाजार पर पड़ सकता है सीधा असर
क्या जल और खाद्य संकट की बढ़ सकती है आशंका?
मानसून सीजन अब अपने अंतिम दौर में पहुंच चुका है और देश के कई हिस्सों से इसकी जल्द विदाई के संकेत मिलने लगे हैं। हिमाचल प्रदेश में भी अगले दो-तीन दिनों के दौरान कुछ इलाकों में हल्की बारिश हो सकती है। इसके बाद करीब 25 सितंबर के आसपास प्रदेश से मानसून की वापसी शुरू होने की संभावना जताई जा रही है। ऐसे में इस बार मानसून के प्रदर्शन को लेकर एक अहम सवाल खड़ा हो रहा है—क्या कम बारिश आने वाले समय में पानी और खाद्य आपूर्ति से जुड़ी चुनौतियां बढ़ा सकती है?
हिमाचल प्रदेश की बात करें तो इस साल मानसून ने राज्य में देर से दस्तक दी। इसके बाद कुछ क्षेत्रों में अच्छी बारिश हुई, जबकि कई इलाकों में वर्षा सामान्य से काफी कम रही। 1 जून से 18 सितंबर के बीच प्रदेश में कुल 631.2 मिलीमीटर बारिश रिकॉर्ड की गई, जबकि इस अवधि का सामान्य औसत 698.3 मिलीमीटर है। यानी राज्य में इस दौरान बारिश सामान्य से लगभग 10 प्रतिशत कम रही।
पिछले वर्षों के आंकड़ों से तुलना करें तो 2024 में हिमाचल में सामान्य से करीब 18 प्रतिशत कम बारिश हुई थी। वहीं 2025 में स्थिति इसके बिल्कुल उलट रही और प्रदेश में सामान्य से लगभग 42 प्रतिशत अधिक वर्षा दर्ज की गई थी। ज्यादा बारिश के कारण पिछले साल राज्य के कई हिस्सों में बड़े स्तर पर नुकसान भी हुआ था।
इस साल भी हिमाचल में बारिश से हजारों करोड़ रुपये के नुकसान की बात सामने आई है, हालांकि पिछले वर्ष की तुलना में तबाही का स्तर कम रहा है। प्रदेश के सभी जिलों में बारिश का पैटर्न भी एक जैसा नहीं रहा। किन्नौर, कुल्लू, शिमला, बिलासपुर और सिरमौर में सामान्य से अधिक बारिश दर्ज की गई, जबकि कई अन्य जिलों में वर्षा सामान्य से नीचे रही।
बारिश की सबसे बड़ी कमी लाहौल-स्पीति में दर्ज हुई, जहां सामान्य की तुलना में वर्षा में 60 प्रतिशत से अधिक की कमी रही। इसके अलावा हमीरपुर, मंडी, सोलन और चंबा में भी सामान्य से कम बारिश रिकॉर्ड की गई।
देशभर में भी सामान्य से कम बारिश
हिमाचल तक ही स्थिति सीमित नहीं है। पूरे देश के मानसून आंकड़ों पर नजर डालें तो इस बार बारिश सामान्य से कम रही है। आईएमडी के आंकड़ों के अनुसार, 1 जून से 18 सितंबर के बीच देश में सामान्य की तुलना में करीब 15 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई।
कम बारिश का असर केवल मौसम तक सीमित नहीं रहता। इसका सीधा संबंध खेती, जल स्रोतों, सिंचाई, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और आगे चलकर बाजार में खाद्य वस्तुओं की उपलब्धता से भी हो सकता है। ऐसे में मानसून की विदाई के बाद आने वाले महीनों में पानी और कृषि उत्पादन की स्थिति पर नजर रखना महत्वपूर्ण होगा।
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