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भांग की खेती को लाइसेंस से जोड़ने की तैयारी, रेशे से बनेंगे कपड़े और शॉल

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हिमाचल प्रदेश में भांग की खेती को लेकर सरकार अब इसे नियंत्रित और लाइसेंस आधारित व्यवस्था के तहत इस्तेमाल करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। कुल्लू क्षेत्र में भांग के रेशे को टैक्सटाइल उद्योग से जोड़कर कपड़े, शॉल, हस्तशिल्प और हथकरघा उत्पाद बनाने की संभावनाओं पर काम किया जा रहा है। इसके अलावा तय नियमों के तहत इसके औषधीय उपयोग के लिए भी खेती की अनुमति दी जा सकेगी।

कुल्लू के विधायक सुंदर सिंह ठाकुर के अनुसार, प्रदेश में भांग की खेती को कानूनी दायरे में लाने के लिए कानून बनाया गया है। उनका कहना है कि इसका उद्देश्य खुले तौर पर नशे के लिए भांग की खेती को प्रोत्साहित करना नहीं है, बल्कि लाइसेंस, नियमों और सरकारी निगरानी के माध्यम से इसके औद्योगिक तथा औषधीय उपयोग को बढ़ावा देना है।

औषधीय खेती के लिए अलग शुल्क

औषधीय उद्देश्य से भांग की खेती करने वाले किसानों के लिए अलग व्यवस्था रखी गई है। किसानों को बीज उपलब्ध कराने की व्यवस्था हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय और बागवानी विश्वविद्यालय के माध्यम से किए जाने की बात कही गई है।

जानकारी के अनुसार सामान्य उपयोग के लिए भांग की खेती पर प्रति बीघा 500 रुपये शुल्क निर्धारित किया गया है, जबकि औषधीय प्रयोजन के लिए प्रति बीघा शुल्क एक लाख रुपये रखा गया है।

सर्वदलीय समिति ने किया विभिन्न राज्यों का अध्ययन

भांग की खेती को कानूनी रूप देने से पहले इसके विभिन्न पहलुओं का अध्ययन किया गया। विधानसभा में राजस्व मंत्री जगत सिंह नेगी के नेतृत्व में गठित सर्वदलीय समिति ने देश के अलग-अलग हिस्सों का दौरा कर वहां भांग की खेती, उसके नियमन और कानूनी उपयोग से जुड़ी व्यवस्थाओं का जायजा लिया।

समिति ने संबंधित व्यवस्थाओं और कानूनी प्रावधानों का अध्ययन करने के बाद अपनी रिपोर्ट तैयार की। इसके आधार पर सीमित क्षेत्रों में नियंत्रित तरीके से खेती की अनुमति देने का फैसला किया गया।

नशे को बढ़ावा देना उद्देश्य नहीं

विधायक सुंदर सिंह ठाकुर ने भांग की खेती को लेकर सामने आ रही नकारात्मक चर्चाओं को खारिज किया है। उन्होंने कहा कि प्रस्तावित व्यवस्था पूरी तरह लाइसेंस और सरकारी नियंत्रण पर आधारित होगी। सरकार का मकसद नशीली गतिविधियों को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि भांग के रेशे और इसके औषधीय उपयोग की संभावनाओं का कानूनी तरीके से इस्तेमाल करना है।

किसानों के लिए अतिरिक्त आय का विकल्प

भांग के रेशे का इस्तेमाल कपड़े, शॉल और कई तरह के हस्तशिल्प व हथकरघा उत्पाद बनाने में किया जा सकता है। ऐसे में इसकी नियंत्रित खेती किसानों के लिए पारंपरिक कृषि के साथ अतिरिक्त आमदनी का माध्यम बन सकती है।

कुल्लू में स्थानीय स्तर पर कच्चा माल उपलब्ध होने से भांग की खेती को क्षेत्र के टैक्सटाइल, हस्तशिल्प और हथकरघा उद्योग से जोड़ने की योजना पर भी विचार किया जा रहा है।

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